स्वयं की पहचान ५-११-२०२०
*मेरी कलम से कविता संग्रह*
*स्वयं की पहचान*
*४-११-२०२०*
अंतर मन में झांका क्या हु में,
स्वयं की पहचान हुई आज ।
जुठ और फरेब से नफ़रत है मुझे,
कडवी और सच बोलना आता है मुझे ।
चापलूसी, जी हजुरी नहीं आती मुझे,
जो जैसा दिखता है मुंह पे बोलती हूं मे ।
भावनायय होकर ठोकर खाई बहोत हैं,
फिर भी फर्ज निभाने से पीछे मुड़ी नहीं में ।
आता नहीं मीठे-मीठे बोल बोलना मुझे,
में जैसी हु वैसी ही रहेना है मुझे ।
मनोमंथन करके खुद को पहेचान मैंने,
स्वयं की पहचान से खुद को जाना मैंने ।
भावना भट्ट अमदाबाद
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*स्वरचित रचना है मेरी किसीकी कोपी नहीं है।*
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